कई शहरों में शहीद आयतुल्लाह ख़ामेनेई की शवयात्रा के जुलूस निकाले जाने के साथ ही उनकी नमाज़े जनाज़ा पढ़ी गयी। वह नमाज़ जिसे परिजन पढ़ते हैं और उस मोमिन के बारे में, जो दुनिया से चला गया है, अल्लाह से बात करते हैं।

मुसलमान मोमिन के शव से संबंधित ज़रूरी संस्कारों में से एक "नमाज़े मय्यत" है। शव को ग़ुस्ल देने और कफ़न पहनाने के बाद, मोमिन मुसलमानों का एक समूह क़िब्ले की ओर रुख़ करके खड़ा होता है इस हालत में कि मोमिन का शव उसके सामने रखा होता है और उस पर नमाज़े मय्यत पढ़ता है। यह नमाज़ दुआओं पर आधारित है कि जिसकी विषयवस्तु दुनिया से चले गए मोमिन के स्थान को ऊंचा करने के लिए अल्लाह से दुआ पर आधारित है।
नमाज़े मय्यत का पढ़ना, ऐसा फ़रीज़ा है कि दुनिया से गए मोमिन के संबंध में बाक़ी मोमिन मुसलमानों पर अनिवार्य है। यही वजह है कि मुसलमानों की अलिखित संस्कृति में, नमाज़े मय्यत में नमाज़ियों की बड़ी तादाद, रिश्तेदारों के दिलों में मरने वालों की मोहब्बत का चिन्ह समझी जाती है।
शिया फ़िक़्ह के मुताबिक़ नमाज़े मय्यत में जो चीज़ पढ़ी जानी है, वह बहुत छोटी है। लेकिन ताकीद की गयी है कि मृतक के लिए ज़्यादा दुआ पढ़ी जाए और उसके संबंध में अल्लाह से ज़्यादा से ज़्यादा हाजतें तलब की जाएं। नमाज़े मय्यत के संबंध में एक अहम बिन्दु, इस नमाज़ में प्रयोग होने वाले शब्द और पढ़ी जाने वाली दुआओं के अर्थ हैं।
शहीद रहबर ने उस नमाज़ में जो शहीद जनरल सुलैमानी के शव पर पढ़ी, नम आँखों से अल्लाह के सामने गवाही दी कि उन्होंने शहीद सुलैमानी और उनके साथियों से भलाई के सिवा कुछ और नहीं देखा। उसी नमाज़ में उन्होंने अल्लाह से अपने लिए शहीद सुलैनामी जैसे अंजाम की दुआ की थी। उस राह में मारा जाना जिसे महान अल्लाह पसंद करता है। उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी में अल्लाह से बार बार यह दुआ की कि उन्होंने जिस पाकीज़ा राह का चयन किया है, उसमें उनकी सबसे बड़ी संपत्ति यानी अपने वजूद को क़ुर्बान करें और अल्लाह और इंसानियत के दुश्मनों से लड़ते हुए मारे जाएं।
इस्लामी इंक़ेलाब के शहीद रहबर सैयद अली हुसैनी ख़ामेनेई के पाकीज़ा शव पर तेहरान, क़ुम, नजफ़, कर्बला और मशहद में जो नमाज़ें पढ़ी गयीं, उन सबके अपने विशेष अंदाज़ थे। प्रचलित है कि नमाज़े मय्यत वह शख़्स पढ़ाए जो इल्म और अध्यात्म में विशेष स्थान रखता हो।
क़ुम में वरिष्ठ धर्मगुरू, तत्वदर्शी और दार्शनिक आयतुल्लाह जवादी आमुली ने नमाज़े मय्यत पढ़ायी जिसमें उन्होंने अल्लाह के सामने गवाई दी कि आयतुल्लाह शहीद सैयद अली हुसैनी ख़ामेनेई, ऐसी हालत में अल्लाह के पास पहुंचे कि वह मुजाहिद, बहुत कोशिश करने वाले, परहेज़गार, निष्ठा से अल्लाह की इताअत करने वाले और क़ुरआन तथा अहलेबैत की राह के शहीद हैं।
शहीद आयतुल्लाह सैयद अली हुसैनी ख़ामेनेई लंबी उम्र तक कोशिश, कठिनाइयों को सहन करने और धैर्य अपनाने के बाद, अंत में उस आरज़ू तक पहुंचे जिसे उन्होंने अल्लाह से मांगा था, और दसियों लाख लोगों ने उन नमाज़ों में जो उनके पाकीज़ा शव पर पढ़ी, उनके नेक होने की गवाही दी।