
इस्लामी इंक़ेलाब के सर्वोच्च नेता का पैग़ाम इस प्रकार हैः
बिस्मिल्लाह अर्रहमान अर्रहीम
सलाम हो उस इमाम पर जिस के क़याम की जीवनदायक आवाज़ ने पैग़म्बरे इस्लाम की बेसत की गूंज को इतिहास के सब से दूर के क्षेत्रों तक पहुंचा दिया और जिसके असर से ईरान का इस्लामी इंक़ेलाब वजूद में आया। ऐसा इंक़ेलाब जिसकी बुनियाद आग़ाज़ से ही हुसैनी थी और जो इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के नारे और सीरत पर आधारित रहा और परवान चढ़ा। "ईरान के शहीद रहबर" भी इसी सीरत पर पले बढ़े। वो हुसैनी थे, उन्होंने हुसैनी अंदाज़ में सोचा, हुसैनी अंदाज़ में आगे बढ़े, हुसैनी अंदाज़ में जेहाद और रेज़िस्टेंस किया, हुसैनी अंदाज़ में ज़िंदगी गुज़ारी और हुसैनी मत की राह में अपना ख़ून पेश कर के शहादत के दर्जे पर पहुंचे।
हुसैनियों की पंक्ति में वो लोग हैं कि जब इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के मत और उनकी राह में उनका ख़ून मज़लूमाना तौर पर ज़मीन पर बहता है तो इस्लामी उम्मत उठ खड़ी होती है और वह वक़्त आशूरा और वह जगह कर्बला से जुड़ जाती है। इस वक़्त भी उसी हुसैनी जोश व जज़्बे ने, हमारी उम्मत को 'बेसत' का मरहला अता किया है और महान ख़ुमैनी और शहीद ख़ामेनेई के मत को नई चमक दी है। यही वह जीवनदायक जोश है जो इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की मज़लूमियत और "कोई है जो मेरी मदद करे" की आवाज़ बनकर पहले ईरान, फिर इराक़ और उसके बाद दूसरे मुल्कों में गूंज रहा है और बातिल की बुनियादों में भूकंप पैदा कर रहा है। इस मौक़े पर ईरान और इराक़ के शहरों और देहातों ख़ास तौर पर तेहरान, क़ुम, नजफ़, कर्बला और मशहद में करोड़ों लोगों को हैरतअंगेज़, दुश्मन का हौसला पस्त करने वाली ऐतिहासिक शिरकत की मैं दिल की गहराई से क़द्रदानी करता हूं।
हमारी क़ौम, इमाम हुसैन के ख़ून का बदला लेने वाली है। इस अज़ीम क़ौम ने बरसों तक अपने सपूतों को इमाम हुसैन की राह में और इमाम हुसैन और हुसैनी सीरत के दुश्मनों के ख़िलाफ़ जंग में क़ुर्बान किया है और अब भी वह उनके और इस दौर के हुसैनियों के ख़ून का बदला लेने वाली है।
अब हम अपने शहीद रहबर से अर्ज़ करते हैं: ऐ मज़लूम मक़तूल! ऐ सरबुलंद मज़लूम! ऐ अल्लाह के नेक बंदे! अब जब हम नम आँखों और दुखी दिलों के साथ आपके पाकीज़ा शव को अलविदा कह रहे हैं तो आपसे अहद करते हैं कि आपके मत की रक्षा करेंगे, उस सीधे रास्ते पर दृढ़ता से चलेंगे जो आपने हमें दिखाया है, उस राह की मुश्किलों से हरगिज़ नहीं घबराएंगे और आप ही की तरह अल्लाह की शुभसूचनाओं और वादों पर पूरा भरोसा करेंगे। हम अहद करते हैं कि आप के पाकीज़ा ख़ून और इन दोनों जंगों के तमाम शहीदों के ख़ून का बदला उन बेग़ैरत और मुजरिम क़ातिलों से ज़रूर लेंगे। यह बदला हमारी क़ौम का मुतालबा है और निश्चित तौर पर यह पूरा होगा। ये अपराधी जिनके बड़ों और छोटों सबकी लिस्ट मौजूद है, सुकून के साथ बिस्तर पर मौत की आरज़ू अपनी क़ब्र में लेकर जाएंगे। उन्हें जान लेना चाहिए कि यह मामला सिर्फ़ मेरी ज़ात या दूसरे अधिकारियों के वजूद पर निर्भर नहीं। हम रहें या न रहें, यह बात होकर रहेगी और बहुत जल्द दुनिया भर के आज़ाद इंसानों में से हर एक इस पाकीज़ा ज़िम्मेदारी के किसी न किसी हिस्से को अंजाम देगा।
ऐ उम्मत के शहीद पिता! शहादत का वह जाम नोश करना, जिसकी आपने उम्र भर आरज़ू की, आपको मुबारक हो। शहादत का वह लेबास, उस जिस्म पर पहनना आपको मुबारक हो जिस पर आपकी सम्मानीय माँ हज़रत फ़ातेमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा, आपके दादा हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और हज़रत अबुल फ़ज़्लिल अब्बास की निशानियां मौजूद हैं। और आप ऐ उनके मज़लूम साथियो! जो दुश्मन के अचानक हमले का निशाना बने और शहादत के दर्जे पर पहुंचे, आप ख़ुशनसीब है कि आज उस मौला के मेहमान हैं जिनकी मेहरबानी और कृपा को आपने दुनिया में बार बार महसूस किया होगा। वह महान हस्ती जो सभी के लिए ख़ास तौर पर इस सरज़मीन के लोगों के लिए अल्लाह की रहमत का दरवाज़ा है, आज आपकी मेज़बान है और उनकी सुरक्षित बारगाह अब आपका घर बन गया है।
और आप ऐ महान आक़ा! ऐ अज़ीम! ऐ मेहरबान इमाम, ऐ इमाम रज़ा अलैहिस्साम, जिन पर अल्लाह का बेहतरीन दुरूद व सलाम हो! आज आप एक ऐसे सेवक का टुकड़े टुकड़े शव, जिसने बरसों मुसलसल मेहनत, संघर्ष और सेवा से आप और पाकीज़ा अहलेबैत की ख़िदमत अंजाम दी, अपने ख़ानदान के उन शहीदों के साथ, जिनमें से हर एक कर्बला के एक शहीद की याद दिलाता है, इस पाक सरज़मीन में उस दिन तक के लिए आराम कर रहा है, जब अल्लाह के हुक्म से, चमकते हुए सूरज हज़रत इमाम महदी (अल्लाह उन्हें जल्द ज़ाहिर करे) ग़ैबत के परदे से ज़ाहिर होंगे और इस धरती के लोगों पर अल्लाह की रहमत के प्रकाश को बिखेरेंगे, उस दिन जिसके बहुत जल्द आने की हमें उम्मीद है, सच्चों, शहीदों और अल्लाह के औलिया में से चमकते सितारे, हज़रत इमाम महदी की मदद और उनके साथ होने का सौभाग्य हासिल करेंगे और हमें उम्मीद है कि हमारे ये शहीद भी उनमें शामिल होंगे और एक बार फिर संघर्ष और 'अल-सित्त' के अहद की वफ़ादारी के बहुत ही सुंदर और विशुद्ध मंज़र पेश करेंगे और शायद आज के ये शहीद साथी भी उस दिन दोबारा उन के साथ हों।
ऐ मेहरबान मौला! हम अपने रहबर को, जिन्होंने अपनी हर चीज़ आपकी राह में क़ुर्बान कर दी और उनके शहीद साथियों को आपकी बारगाह में और आपकी कृपा और मेहरबानी के सुपुर्द करते हैं ताकि जिस तरह वह दुनिया की ज़िंदगी में आपकी मेहरबानियों के पात्र बनते रहे, उसी तरह बल्कि उससे कहीं बढ़कर आगे भी आपकी कृपा और मेहरबानी से लाभान्वित होते रहें।
आख़िर में हम एक बार फिर अपने मौला हज़रत इमाम महदी (अल्लाह उन्हें जल्द ज़ाहिर करे) की सेवा में सांत्वना पेश करते हैं और इस मेहरबान हस्ती से दरख़ास्त करते हैं कि वह अपनी पाकीज़ा दुआओं का रुख़ ईरान के इस शहीद, इन के शहीद साथियों और तमाम शहीदों की ओर मोड़ें और महान अल्लाह की बारगाह से तमाम शहीदों के दर्जों की बुलंदी, उनके परिजनों के लिए सब्र और अज्र और मज़लूम ईरानी क़ौम के लिए निश्चित और जल्द मिलने वाली फ़तह की दुआ फ़रमाएं। इंशा अल्लाह।
सैयद मुज्तबा हुसैनी ख़ामेनेई
9 जुलाई 2026