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बग़दाद में "नए वर्ल्ड ऑर्डर का उदय" नामक किताब रिलीज़

आदिल अब्दुल महदीः ईरान के सर्वोच्च नेता और अवाम की दृढ़ता ने, जंग के समीकरण को बदल दिए

बग़दाद में "नए वर्ल्ड ऑर्डर का उदय" नामक किताब रिलीज़ हुयी जिसके प्रोग्राम में इराक़ की राजनैतिक और सांस्कृतिक हस्तियों और इस्लामी गणराज्य ईरान के प्रतिनिधियों ने शिरकत की।

शनिवार 15 अगस्त 2026 की शाम कोइराक़ की राजधानी बग़दाद के इंतेसार हॉल में, इस्लामी इंक़ेलाब के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह सैयद मुज्तबा ख़ामेनेई के विचार में "नया वर्ल्ड ऑर्डर संगोष्ठी" आयोजित हुई जिसमें, इराक़ में इस्लामी गणराज्य ईरान के राजदूत और इराक़ की राजनैतिक, सांस्कृतिक तथा इल्मी हस्तियों ने शिरकत की। 

इस सभा को, जिसमें इराक़ के कुछ सांसदों, इस मुल्क के प्रोफ़ेसर, विचारक, लेखकों तथा सांस्कृतिक हस्तियों ने शिरकत की, इराक़ के भूतपूर्व प्रधानमंत्री आदिल अब्दुल महदी, इराक़ी सांसद मोहतरमा डॉक्टर नूर आदिल, बग़दाद में ईरान के राजदूत मोहम्मद काज़िम आले सादिक़ और इस्लामी इंक़ेलाब के नेता की रचनाओं के संरक्षण व प्रकाशन विभाग के उपप्रमुख डॉक्टर मोहम्मद अख़गरी ने संबोधित किया। इसी तरह इराक़ की उच्च इस्लामी परिषद के प्रमुख शैख़ हम्माम हमूदी ने भी इस संगोष्ठी में शिरकत की। 

किताब की रिलीज़ के दौरानइराक़ के पूर्व प्रधान मंत्री आदिल अब्दुल महदी ने कहाः आज नए वर्ल्ड ऑर्डर के जन्म लेने की अनेक निशानियां नज़र आ रही हैं और पुराना वर्ल्ड ऑर्डर जो वर्चस्व, साम्राज्यवाद और क़ौमों पर वर्चस्व पर आधारित था, आर्थिकक़ानूनीसांस्कृतिकनैतिक और आस्था सहित अनेक क्षेत्रों में पतन की ओर बढ़ रहा है।

उन्होंने अपनी स्पीच में पूर्व सोवियत संघ के विघटन के हालात और मीख़ाईल गोर्बाचोफ़ को इमाम ख़ुमैनी के पैग़ाम की ओर इशारा किया और कहा कि उस पैग़ाम ने भविष्य में दुनिया के हालात पर इस्लामी गणराज्य के संस्थापक की नज़र और रेज़िस्टेंस की नीति का पता दिया था। आदिल अब्दुल महदी ने कहाः आख़िरकार पूर्व सोवियत संघ का विघटन हुआ और इस बदलाव को दुनिया के इतिहास में बहुत बड़ा मोड़ समझा जाता है। 

इराक़ के पूर्व प्रधान मंत्री ने पश्चिमी देशों के रवैये की आलोचना करते हुए आगे कहा, पश्चिमी मुल्कों की ओर से प्रजातंत्रमानवाधिकार और महिला अधिकार जैसे नारे ऐसी हालत में लगाए जाते हैं कि यही देश ग़ज़ा में नस्ली सफ़ाए और क़त्ले आम और क्षेत्र के हालात के संबंध में ख़ामोश रहे या ख़ुद उसमें लिप्त रहे। 

इसी तरह उन्होंने इस्लामी गणराज्य ईरान के ख़िलाफ़ हालिया जंग की ओर इशारा करते हुए कहा कि अमरीकाइस्राईली शासन और कुछ यूरोपीय ताक़तों की भागीदारी के बावजूदईरान के अवाम और सर्वोच्च नेता के रेज़िस्टेंस और दृढ़ता से समीकरण बदल गए हैं। 

आदिल अब्दुल महदी ने "नए वर्ल्ड ऑर्डर का उदय" नामक किताब रिलीज़ होने की ओर इशारा करते हुएउसे पेज के लेहाज़ से कम लेकिन अर्थ के लेहाज़ से बहुत अहम किताब बताया और कहा कि यह किताब इस्लामी गणराज्य के इतिहासविलायते फ़क़ीहवरिष्ठ धार्मिक नेतृत्व की शर्तोंवरिष्ठ नेता का चयन करने वाली असेंबली और ईरान की राजनैतिक और सामाजिक स्थिति के मुख़्तलिफ़ आयामों की समीक्षा करती है। 

उन्होंने कहाः इस किताब के कुछ हिस्सेआयतुल्लाह सैयद मुज्तबा हुसैनी ख़ामेनेई के संघर्ष के अतीतइल्मी सरगर्मियों और उनकी सामाजिक स्थिति से विशेष हैं और उनके उस्तादोंशिष्योंसहकर्मियों और समाज से उनके संपर्क के बारे में जानकारी पेश करती है। 

इराक़ के पूर्व प्रधान मंत्री ने इसी तरह ईरान के राजनैतिक हालात में अवाम के रोल पर बल देते हुए कहा कि इस किताब में इस नज़रिए पर बल दिया गया है कि अवाम सिर्फ़ सर्वोच्च नेता के अनुयायी नहीं हैं बल्कि हालात को दिशा देने में उनका रोल है और नेता भी अवाम से सीखते हैं। 

आदिल अब्दुल महदी ने अपनी स्पीच के अंत में कहाः यह किताब राजनैतिक और सामाजिक हालात की समीक्षा के अलावाआयतुल्लाह सैयद मुज्तबा हुसैनी ख़ामेनेई के व्यक्तिगत जीवन और उनकी फ़ैमिली के वर्णन के साथ हीइस बात की कोशिश करती है कि उनकी सादा और विनम्रतापूर्ण जीवन शैली और इसी प्रकार उनके धार्मिक और राजनैतिक नज़रिए को पेश करे।

इस प्रोग्राम कोइराक़ में इस्लामी गणराज्य ईरान के राजदूत मोहम्मद काज़िम आले सादिक़ ने भी संबोधित किया। उन्होंने इस्लामी क्रांति संस्था द्वारा इस किताब के प्रकाशन की सराहना के साथ ही कहाः यह किताब एक अहम ऐतिहासिक व वैचारिक अनुभव के मुख़्तलिफ़ आयाम को पहचानने और उसकी समीक्षा के लिए पृष्ठिभूमि बन सकती हैऐसा अनुभव जो किसी समयावधि या एक शख़्सियत तक सीमित नहीं हैबल्कि वह अपने भीतर धर्मगुरुओंक्रांतियोंक़ौमों के रोल और भविष्य के हालात के क्षितिज को भी समोए होता है। 

आले सादिक़ ने इन संगोष्ठियों के आयोजन की अहमियत की ओर इशारा करते हुए कहाः ऐसी सभाओं का आयोजनऐसी रचनाओं और शख़्सियतों पर ध्यान देने के लिए मूल्यवान अवसर है कि जिनकी बेहतर पहचान, इस्लामी जगत के राजनैतिकसामाजिक और वैचारिक हालात को बेहतर ढंग से समझने में मदद करती है। 

उन्होंने कहाः इन विषयों की समीक्षा सिर्फ़ अतीत का दोबारा वर्णन नहीं हैबल्कि मौजूदा हालात की बेहतर पहचान और उस चीज़ को समझने में मदद करती है जो भविष्य में क़ौमों के सामने आने वाले हैं। इस लेहाज़ से ऐसी रचनाओं का अध्ययन और परिचय विशेष अहमियत रखता है और यहबुद्धिजीवियोंओलमाजवान नस्ल और सांस्कृतिक तथा राजनैतिक कार्यकर्ताओं के बीच संवाद और ज़्यादा से ज़्यादा पहचान की पृष्ठभूमि मुहैया करता है। 

आले सादिक़ ने अपनी स्पीच के अंत में बल दिया कि क़ौमों के आंदोलन और इतिहास की धाराएं अंततः अल्लाह के इरादे और इंसानों की कोशिशों पर निर्भर होती हैं।

इस्लामी इंक़ेलाब संरक्षण व प्रकाशन विभाग के उपप्रमुख डॉक्टर मोहम्मद अख़्गरी ने अपनी स्पीच मेंइस बात का ज़िक्र करते हुए कि समकालीन दौर की समझदुनिया में ताक़त के ढांचे में आए गहरे उथल पुथल को समझे बिना मुमकिन नहीं हैकहाः शहीद व मुजाहिद इमाम ने दुनिया में ताक़त की नई रूपरेखा की कुछ निशानियां पेश कीं जो इस प्रकार हैं: विचार और नैतिकता के स्तर पर पश्चिम के लिबरल डेमोक्रेसी के वर्ल्ड-वीव का पतन कि जिसका नमूना आज का एप्सटीन प्रकरण है, अमरीका और एकध्रुवीय व्यवस्था का पतनताक़त का एशिया की ओर स्थानांतरणदुनिया में रेज़िस्टेंस के विचार का प्रकट होना और फैलना। 

उन्होंने "नए वर्ल्ड ऑर्डर का उदय" नामक किताब के संबंध में कहाः यह किताब जिसे हम रिलीज़ कर रहे हैंइस्लामी इंक़ेलाब के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह सैयद मुज्तबा ख़ामेनेई की शख़्सियत का परिचय कराने के अलावाउनके पैग़ामों के बीचइस नए वर्ल्ड ऑर्डर को बयान करती है जो 40 दिन की जंग में प्रकट हुआ। 

उन्होंने ने इस बात का ज़िक्र करते हुए कि इतिहास अपना पन्ना पलट रहा हैबल दियाः हम ऐसी दुनिया को देख रहे हैं जो तेज़ी से कई ध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है।

पश्चिम की पूरी तरह वर्चस्व जमाने की कोशिशबेकार हो गयी है। दुनिया का भविष्यअब वॉशिंग्टन के थिंक टैंकों में तय नहीं होगा। 

उन्होंने आगे कहाः भविष्य उन ताक़तों का है जिनकी स्वाधीनता उनकी भीतरी ताक़त पर निर्भर है। हम वर्चस्व जमाने का इरादा नहीं रखते बल्कि ऐसी दुनिया की बुनियाद रखना चाहते हैं जहाँ ज़ोर ज़बरदस्ती की जगहन्याय और क़ौमों के इरादे का सम्मान हो। हम ऐसी सभ्यता के मार्ग की ओर क़दम उठा रहे हैं कि जिसमें दुनिया का भविष्य अच्छा होगा। 

इस सभा कोइराक़ी सांसद मोहतरमा नूर आदिल ने भी संबोधित किया। उन्होंने क्षेत्र की क़ौमों के बीच रेज़िस्टेंस और आशूरा की संस्कृति की अहमियत की ओर इशारा करते हुए बल दिया कि शहादत और दृढ़ता ऐसा मार्ग है जो ख़त्म नहीं होता बल्कि क़ौमों के बीच व्यापक इरादे के वजूद में आने की पृष्ठिभूमि बन सकता है।

उन्होंने इस्लामी इंक़ेलाब के शहीद रहबर की शवयात्रा में अवाम की बड़े पैमाने पर शिरकत की ओर इशारा करते हुए कहाः इस प्रोग्राम में जो चीज़ नज़र आयी वह सिर्फ़ कैमरों के सामने लोगों की मौजूदगी या परचमों और नारों की नुमाइश नहीं थीबल्कि दसियों लाख नौजवानोंमर्दोंऔरतों और बूढ़ों ने ख़ुद से प्रेरित होकर वफ़ादारी के जज़्बे से इन प्रोग्रामों में शिरकत की। 

नूर आदिल ने कहाः इस व्यापक शिरकत में आशूरा और इमाम हुसैन की राह के प्रति वफ़ादारी की झलक देखी जा सकती हैमानो इस ऐतिहासिक शौर्यगाथा को रचने वाले अवाम अपने समय को पहचान गए और अपनी मौजूदगी से एक बार फिर यह सिद्ध किया कि क्षेत्र की क़ौमों के बीच आशूरा ज़िंदा है। 

इराक़ की इस सांसद ने ईरान और इराक़ की क़ौमों के बीच गहरे संबंध पर बल देते हुए कहाः जिस लड़ाई को हमलावरसीमा पार सेसमुद्र के उस पार से क्षेत्र की क़ौमों के ख़िलाफ़ शुरू करते हैंइराक़ और ईरान के अवाम उसमें एक दूसरे का साथ देते हैं और उनका पाकीज़ा ख़ूनहमलों और वर्चस्व के मुक़ाबले में एक वास्तविक समीकरण को जन्म देता है। 

उन्होंने इस्लामी इंक़ेलाब के शहीद रहबर की शवयात्रा में इराक़ी अवाम के मुख़्तलिफ़ वर्गो की ख़ुद से शिरकत का स्रोतउनकी ज़िम्मेदारी की भावना और बहादुरी तथा हुसैनी जज़्बे को बताया। 

इराक़ की इस सांसद ने यह सवाल करते हुए कि "शहीद का ख़ून किस वक़्त नाकामी का सबब बन सकता है?" कहाः जब हम शवयात्रा के प्रोग्राम को सिर्फ़ एक परंपरा में बदल दें और शहीद के पैग़ाम को भुला देंजिस वक़्त हम शहीदों को उनकी तस्वीरों को सड़कों पर लगाने तक सीमित कर दें और उनके उसूलों और आकांक्षाओं को भुला दें। 

इस सभा के मौक़े परबग़दाद बुक फ़ेयर में शिरकत करने वालोंबुद्धिजीवियों और शख़्सियतों की शिरकत के साथ कुछ नुमाइशें भी आयोजित हुयीं जिसमें एक अहम नुमाइशइराक़ में शहीद इमाम सैयद अली ख़ामेनेई की शवयात्रा की चुनी हुयी तस्वीरों की नुमाइश भी थी जो पहली बार आयोजित हुयी।
 

इस संगोष्ठी के अंत में इराक़ में पहली बार "नए वर्ल्ड ऑर्डर का उदय" नामक किताब की अरबी प्रति रिलीज़ हुयी। इस किताब की रिलीज़ के लिए इराक़ का चयन अहमियत रखता है क्योंकि एक ओर इराक़ रेज़िस्टेंस मोर्चे के अहम मुल्कों में से एक है और दूसरी ओर इस मुल्क के अवाम ने इमाम शहीद ख़ामेनेई की शवयात्रा में अपनी बेमिसाल और ऐतिहासिक शिरकत कर, रेज़िस्टेंस की राह और विचार के प्रति अपनी श्रद्धा और अनुपालन और साम्राज्यवाद तथा नाजायज़ क़ब्ज़ा करने वालों के ख़िलाफ़ अपनी दृढ़ता का परिचय दिया। 

 

"नए वर्ल्ड ऑर्डर का उदय" नामक किताब, इस्लामी इंक़ेलाब के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह सैयद मुज्तबा हुसैनी ख़ामेनेई की जीवनी और विचारों पर एक नज़र है, जिसे अंतर्राष्ट्रीय पाठकों के लिए तीन अध्याय में उनकी ज़िंदगी और विचारों का परिचय कराने के लिए संकलित किया गया है। 

उल्लेखनीय है कि आगामी 27 सितम्बर को प्रस्तावित 27वें बग़दाद अंतर्राष्ट्रीय बुक फ़ेयर में, "नए वर्ल्ड ऑर्डर का उदय" नामक किताब और "इस्लामी इंक़ेलाब" प्रकाशन की कुछ दूसरी किताबें भी, इस प्रकाशन के बूथ पर, पाठकों के लिए पेश की जाएंगी।