
शनिवार 15 अगस्त 2026 की शाम को इराक़ की राजधानी बग़दाद के इंतेसार हॉल में, "आयतुल्लाह सैयद मुज्तबा ख़ामेनेई के विचार में नया वर्ल्ड ऑर्डर" संगोष्ठी के आयोजन के दौरान, "नए वर्ल्ड ऑर्डर का उदय" नामक किताब रिलीज़ हुयी।
किताब की रिलीज़ के दौरान, इराक़ के पूर्व प्रधान मंत्री आदिल अब्दुल महदी ने कहाः आज नए वर्ल्ड ऑर्डर के जन्म लेने की अनेक निशानियां नज़र आ रही हैं और पुराना वर्ल्ड ऑर्डर जो वर्चस्व, साम्राज्यवाद और क़ौमों पर वर्चस्व पर आधारित था, आर्थिक, क़ानूनी, सांस्कृतिक, नैतिक और आस्था सहित अनेक क्षेत्रों में पतन की ओर बढ़ रहा है।
उन्होंने अपनी स्पीच में पूर्व सोवियत संघ के विघटन के हालात और मीख़ाईल गोर्बाचोफ़ को इमाम ख़ुमैनी के पैग़ाम की ओर इशारा किया और कहा कि उस पैग़ाम ने भविष्य में दुनिया के हालात पर इस्लामी गणराज्य के संस्थापक की नज़र और रेज़िस्टेंस की नीति का पता दिया था। आदिल अब्दुल महदी ने कहाः आख़िरकार पूर्व सोवियत संघ का विघटन हुआ और इस बदलाव को दुनिया के इतिहास में बहुत बड़ा मोड़ समझा जाता है।
इराक़ के पूर्व प्रधान मंत्री ने पश्चिमी देशों के रवैये की आलोचना करते हुए आगे कहा, पश्चिमी मुल्कों की ओर से प्रजातंत्र, मानवाधिकार और महिला अधिकार जैसे नारे ऐसी हालत में लगाए जाते हैं कि यही देश ग़ज़ा में नस्ली सफ़ाए और क़त्ले आम और क्षेत्र के हालात के संबंध में ख़ामोश रहे या ख़ुद उसमें लिप्त रहे।
इसी तरह उन्होंने इस्लामी गणराज्य ईरान के ख़िलाफ़ हालिया जंग की ओर इशारा करते हुए कहा कि अमरीका, इस्राईली शासन और कुछ यूरोपीय ताक़तों की भागीदारी के बावजूद, ईरान के अवाम और सर्वोच्च नेता के रेज़िस्टेंस और दृढ़ता से समीकरण बदल गए हैं।
आदिल अब्दुल महदी ने "नए वर्ल्ड ऑर्डर का उदय" नामक किताब रिलीज़ होने की ओर इशारा करते हुए, उसे पेज के लेहाज़ से कम लेकिन अर्थ के लेहाज़ से बहुत अहम किताब बताया और कहा कि यह किताब इस्लामी गणराज्य के इतिहास, विलायते फ़क़ीह, वरिष्ठ धार्मिक नेतृत्व की शर्तों, वरिष्ठ नेता का चयन करने वाली असेंबली और ईरान की राजनैतिक और सामाजिक स्थिति के मुख़्तलिफ़ आयामों की समीक्षा करती है।
उन्होंने कहाः इस किताब के कुछ हिस्से, आयतुल्लाह सैयद मुज्तबा हुसैनी ख़ामेनेई के संघर्ष के अतीत, इल्मी सरगर्मियों और उनकी सामाजिक स्थिति से विशेष हैं और उनके उस्तादों, शिष्यों, सहकर्मियों और समाज से उनके संपर्क के बारे में जानकारी पेश करती है।
इराक़ के पूर्व प्रधान मंत्री ने इसी तरह ईरान के राजनैतिक हालात में अवाम के रोल पर बल देते हुए कहा कि इस किताब में इस नज़रिए पर बल दिया गया है कि अवाम सिर्फ़ सर्वोच्च नेता के अनुयायी नहीं हैं बल्कि हालात को दिशा देने में उनका रोल है और नेता भी अवाम से सीखते हैं।
आदिल अब्दुल महदी ने अपनी स्पीच के अंत में कहाः यह किताब राजनैतिक और सामाजिक हालात की समीक्षा के अलावा, आयतुल्लाह सैयद मुज्तबा हुसैनी ख़ामेनेई के व्यक्तिगत जीवन और उनकी फ़ैमिली के वर्णन के साथ ही, इस बात की कोशिश करती है कि उनकी सादा और विनम्रतापूर्ण जीवन शैली और इसी प्रकार उनके धार्मिक और राजनैतिक नज़रिए को पेश करे।
इस प्रोग्राम को, इराक़ में इस्लामी गणराज्य ईरान के राजदूत मोहम्मद काज़िम आले सादिक़ ने भी संबोधित किया। उन्होंने इस्लामी क्रांति संस्था द्वारा इस किताब के प्रकाशन की सराहना के साथ ही कहाः यह किताब एक अहम ऐतिहासिक व वैचारिक अनुभव के मुख़्तलिफ़ आयाम को पहचानने और उसकी समीक्षा के लिए पृष्ठिभूमि बन सकती है; ऐसा अनुभव जो किसी समयावधि या एक शख़्सियत तक सीमित नहीं है, बल्कि वह अपने भीतर धर्मगुरुओं, क्रांतियों, क़ौमों के रोल और भविष्य के हालात के क्षितिज को भी समोए होता है।
आले सादिक़ ने इन संगोष्ठियों के आयोजन की अहमियत की ओर इशारा करते हुए कहाः ऐसी सभाओं का आयोजन, ऐसी रचनाओं और शख़्सियतों पर ध्यान देने के लिए मूल्यवान अवसर है कि जिनकी बेहतर पहचान, इस्लामी जगत के राजनैतिक, सामाजिक और वैचारिक हालात को बेहतर ढंग से समझने में मदद करती है।
उन्होंने कहाः इन विषयों की समीक्षा सिर्फ़ अतीत का दोबारा वर्णन नहीं है, बल्कि मौजूदा हालात की बेहतर पहचान और उस चीज़ को समझने में मदद करती है जो भविष्य में क़ौमों के सामने आने वाले हैं। इस लेहाज़ से ऐसी रचनाओं का अध्ययन और परिचय विशेष अहमियत रखता है और यह, बुद्धिजीवियों, ओलमा, जवान नस्ल और सांस्कृतिक तथा राजनैतिक कार्यकर्ताओं के बीच संवाद और ज़्यादा से ज़्यादा पहचान की पृष्ठभूमि मुहैया करता है।
आले सादिक़ ने अपनी स्पीच के अंत में बल दिया कि क़ौमों के आंदोलन और इतिहास की धाराएं अंततः अल्लाह के इरादे और इंसानों की कोशिशों पर निर्भर होती हैं।
इस्लामी इंक़ेलाब संरक्षण व प्रकाशन विभाग के उपप्रमुख डॉक्टर मोहम्मद अख़्गरी ने अपनी स्पीच में, इस बात का ज़िक्र करते हुए कि समकालीन दौर की समझ, दुनिया में ताक़त
के ढांचे में आए गहरे उथल पुथल को समझे बिना मुमकिन नहीं है, कहाः शहीद व मुजाहिद इमाम ने दुनिया में ताक़त की नई रूपरेखा की कुछ निशानियां पेश कीं जो इस प्रकार हैं: विचार और नैतिकता के स्तर पर पश्चिम के लिबरल डेमोक्रेसी के वर्ल्ड-वीव का पतन कि जिसका नमूना आज का एप्सटीन प्रकरण है, अमरीका और एकध्रुवीय व्यवस्था का पतन, ताक़त का एशिया की ओर स्थानांतरण, दुनिया में रेज़िस्टेंस के विचार का प्रकट होना और फैलना।
उन्होंने "नए वर्ल्ड ऑर्डर का उदय" नामक किताब के संबंध में कहाः यह किताब जिसे हम रिलीज़ कर रहे हैं, इस्लामी इंक़ेलाब के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह सैयद मुज्तबा ख़ामेनेई की शख़्सियत का परिचय कराने के अलावा, उनके पैग़ामों के बीच, इस नए वर्ल्ड ऑर्डर को बयान करती है जो 40 दिन की जंग में प्रकट हुआ।
उन्होंने ने इस बात का ज़िक्र करते हुए कि इतिहास अपना पन्ना पलट रहा है, बल दियाः हम ऐसी दुनिया को देख रहे हैं जो तेज़ी से कई ध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है।
पश्चिम की पूरी तरह वर्चस्व जमाने की कोशिश, बेकार हो गयी है। दुनिया का भविष्य, अब वॉशिंग्टन के थिंक टैंकों में तय नहीं होगा।
उन्होंने आगे कहाः भविष्य उन ताक़तों का है जिनकी स्वाधीनता उनकी भीतरी ताक़त पर निर्भर है। हम वर्चस्व जमाने का इरादा नहीं रखते बल्कि ऐसी दुनिया की बुनियाद रखना चाहते हैं जहाँ ज़ोर ज़बरदस्ती की जगह, न्याय और क़ौमों के इरादे का सम्मान हो। हम ऐसी सभ्यता के मार्ग की ओर क़दम उठा रहे हैं कि जिसमें दुनिया का भविष्य अच्छा होगा।
इस सभा को, इराक़ी सांसद मोहतरमा नूर आदिल ने भी संबोधित किया। उन्होंने क्षेत्र की क़ौमों के बीच रेज़िस्टेंस और आशूरा की संस्कृति की अहमियत की ओर इशारा करते हुए बल दिया कि शहादत और दृढ़ता ऐसा मार्ग है जो ख़त्म नहीं होता बल्कि क़ौमों के बीच व्यापक इरादे के वजूद में आने की पृष्ठिभूमि बन सकता है।
उन्होंने इस्लामी इंक़ेलाब के शहीद रहबर की शवयात्रा में अवाम की बड़े पैमाने पर शिरकत की ओर इशारा करते हुए कहाः इस प्रोग्राम में जो चीज़ नज़र आयी वह सिर्फ़ कैमरों के सामने लोगों की मौजूदगी या परचमों और नारों की नुमाइश नहीं थी, बल्कि दसियों लाख नौजवानों, मर्दों, औरतों और बूढ़ों ने ख़ुद से प्रेरित होकर वफ़ादारी के जज़्बे से इन प्रोग्रामों में शिरकत की।
नूर आदिल ने कहाः इस व्यापक शिरकत में आशूरा और इमाम हुसैन की राह के प्रति वफ़ादारी की झलक देखी जा सकती है; मानो इस ऐतिहासिक शौर्यगाथा को रचने वाले अवाम अपने समय को पहचान गए और अपनी मौजूदगी से एक बार फिर यह सिद्ध किया कि क्षेत्र की क़ौमों के बीच आशूरा ज़िंदा है।
इराक़ की इस सांसद ने ईरान और इराक़ की क़ौमों के बीच गहरे संबंध पर बल देते हुए कहाः जिस लड़ाई को हमलावर, सीमा पार से, समुद्र के उस पार से क्षेत्र की क़ौमों के ख़िलाफ़ शुरू करते हैं, इराक़ और ईरानी के अवाम उसमें एक दूसरे का साथ देते हैं और उनका पाकीज़ा ख़ून, हमलों और वर्चस्व के मुक़ाबले में एक वास्तविक समीकरण को जन्म देता है।
उन्होंने इस्लामी इंक़ेलाब के शहीद रहबर की शवयात्रा में इराक़ी अवाम के मुख़्तलिफ़ वर्गो की ख़ुद से शिरकत का स्रोत, उनकी ज़िम्मेदारी की भावना और बहादुरी तथा हुसैनी जज़्बे को बताया।
इराक़ की इस सांसद ने यह सवाल करते हुए कि "शहीद का ख़ून किस वक़्त नाकामी का सबब बन सकता है ?" कहाः जब हम शवयात्रा के प्रोग्राम को सिर्फ़ एक परंपरा में बदल दें और शहीद के पैग़ाम को भुला दें; जिस वक़्त हम शहीदों को उनकी तस्वीरों को सड़कों पर लगाने तक सीमित कर दें और उनके उसूलों और आकांक्षाओं को भुला दें।
इस सभा के मौक़े पर, बग़दाद बुक फ़ेयर में शिरकत करने वालों, बुद्धिजीवियों और शख़्सियतों की शिरकत के साथ कुछ नुमाइशें भी आयोजित हुयीं जिसमें एक अहम नुमाइश, इराक़ में शहीद इमाम सैयद अली ख़ामेनेई की शवयात्रा की चुनी हुयी तस्वीरों की नुमाइश भी थी जो पहली बार आयोजित हुयी।