एकता सप्ताह के मौक़े पर इस्लामी इंक़ेलाब के सर्वोच्च नेता का पैग़ाम
एकता सप्ताह के मौक़े पर इस्लामी इंक़ेलाब के सर्वोच्च नेता का पैग़ाम

एकता सप्ताह के मौक़े पर इस्लामी इंक़ेलाब के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह मुज्तबा हुसैनी ख़ामेनेई का पैग़ाम इस प्रकार हैः
बिस्मिल्लाह अर्रहमान अर्रहीम
"मोहम्मद (स) अल्लाह के रसूल हैं और जो लोग उनके साथ हैं वो काफ़िरों पर सख़्त हैं और आपस में मेहरबान हैं...।" (सूरए फ़त्ह, आयत-29)
सबसे अज़ीम सितारे की मुबारक हस्ती, सर्वश्रेष्ठ मख़लूक़, अल्लाह के चुने हुए बंदे, इल्म के शहर, पूरी सृष्टि के लिए रहमत, पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम और उनकी पाक व पाकीज़ा संतान, अल्लाह की संपूर्ण हुज्जत हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम के शुभ जन्म दिवस के उपलक्ष्य में ईरान की अज़ीम क़ौम और पूरी इस्लामी उम्मत की सेवा में मुबारकबाद पेश करता हूं।
जबसे अंतिम ईश्वरीय दूत के पाकीज़ा वजूद का चमकता सूरज मक्का में उदय हुआ, मानव कल्याण के क्षितिज को, जो परम सत्य अल्लाह की संपूर्ण बंदगी और इताअत के अधीन है, एक नई रौशनी हासिल हो गयी। अल्लाह के दूत, फ़रिश्तों और नेक बंदों की आत्माएं ख़ुशी में डूब गयीं और इंसानों तथा जिन्नातों में पाए जाने वाले शैतानों ने ग़ुस्से, निराशा और दुख से अपनी उंगलियां चबा लीं। क्योंकि अल्लाह के तमाम अनगिनत मख़लूक़ों में सर्वश्रेष्ठ हस्ती, इस धरती पर क़दम रख रही थी जो जल्द ही पैग़म्बरी और अंतिम ईश्वरीय दूत का सुंदर लिबास पहनकर, हाथ में अज़ीम क़ुरआन लेकर और इंसान के व्यापक मार्गदर्शन का मिशन संभालकर, इंसानियत के अज़ीम क़ाफ़िले की हरकत को अल्लाह की बंदगी तथा उसकी सिम्त कमाल के सफ़र की ओर मोड़ने वाले थी। पैग़म्बरे इस्लाम और उनके मासूम उत्तराधिकारियों की पूरी ज़िंदगी, मार्गदर्शन और बंदगी का सबक़, आत्मज्ञान और मोहब्बत का सबक़, अक़ीदे और जेहाद का सबक़, ज़िंदगी और व्यक्तिगत तथा सामाजिक स्तर पर नैतिकता का सबक़, ईमानदारी और सच्चाई का सबक़, इज़्ज़त और सम्मान का सबक़, इल्म और अमल का सबक़, रहमत और दृढ़ता का सबक़, न्याय और इंसाफ़ का सबक़ और एकता व भाईचारे का सबक़ है। यह सारे सबक़ जितना बेहतर अंदाज़ में सीखे जाएं और उन पर अमल किया जाए, मानवता के लिए कल्याण और सौभाग्य की बुलंदियों तक पहुंचना उतना ही आसान हो जाता है। हमारा अक़ीदा है कि पैग़म्बरे इस्लाम की पाकीज़ा आत्मा और इसी तरह उनके पाकीज़ा उत्तराधिकारी और पाकीज़ा हुज्जतों की पाकीज़ा आत्माएं, उन सब पर अल्लाह का दुरूद व सलाम हो, मुसलमानों और इस्लामी समाज के हालात पर हमेशा निगाह रखती हैं, उनका मार्गदर्शन करती हैं और उन पर मेहरबान हैं। जब इस मेहरबान और महान पिता की संतानों से कोई ग़लती होती है तो वह दुखी होते हैं और जब मुसलमान उनकी शिक्षाओं और आदेशों पर अमल करते हैं तो उनका मुबारक दिल ख़ुश होता है।
आज इस्लाम और इस्लाम वाले, इस्लाम के आग़ाज़ से लेकर अब तक के कठिन और अशांत युगों से गुज़रने और अनेक उतार चढ़ाव तय करने के बाद एक निर्णायक चरण में पहुंच चुके हैं। आज मुसलमान एक बहुत प्रभावी और इतिहास लिखने वाला किरदार अदा कर सकते हैं। आज वह दिन है जब असत्य पर सत्य के और कुफ़्र पर इस्लाम के निश्चित वर्चस्व का क्षितिज, पिछले सभी युगों की तुलना में कहीं ज़्यादा स्पष्ट तौर पर हक़ीक़त के क़रीब पहुंच चुका है।
इस अहम मक़सद की पहली शर्त मुसलमानों की एकता है। वैश्विक कुफ़्र के मुक़ाबले में मुसलमानों की एकता कोई सतही या अस्थायी मसला नहीं बल्कि एक क़ुरआनी रणनीति और हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम के शुद्ध इस्लाम की मौलिक शिक्षा है। एकता से मुराद यह है कि इस्लामी समाजों में अवाम के स्तर पर सबके बीच संयुक्त बिंदुओं को आधार और उसूल क़रार दिया जाए। बेशक कोशिश की जाए कि ठोस तर्कों की बुनियाद पर भाईचारे और सहयोग के तमाम मामलों को मद्देनज़र रखते हुए और जैसा कि क़ुरआन की शिक्षाओं से पता चलता है, पूरे अमन और निष्ठा के साथ मतभेद की बातों को संयुक्त बिंदुओं में बदल दिया जाए।
जो बात निश्चित है वह यह है कि इस्लामी समाजों में तमाम मुसलमान वैश्विक कुफ़्र के मुक़ाबले में क़ुरआन के उसूल "काफ़िरों पर सख़्त और आपस में मेहरबान" को अपनी सोच, बातचीत और अमल की बुनियाद क़रार दें, इस्लामी एकता इसी तरह हासिल होगी। जब भी इस आसमानी पैग़ाम के दोनों हिस्सों में से कोई भी हिस्सा मुसलमानों के व्यवहार से दूर हो जाएगा वह इज़्ज़त व सम्मान के बिंदु से दूर हो जाएंगे जो इस्लामी समाज में उन्हें बजा तौर पर हासिल हुआ था, यह एक अटल नियम है।
यह नियम इस्लामी इंक़ेलाब के मूल उसूलों और संदेशों में से एक है। पहली बार एकता सप्ताह मनाने का ज़माना फ़रवरी 1978 और ज़ालिम पहलवी सिस्टम के ख़िलाफ़ संघर्ष के दौर से तअल्लुक़ रखता है; जब महान शहीद रहबर ने (अल्लाह उनके दर्जे बुलंद करे) ईरानशहर में अपनी जिलावतनी के दौरान यह सोच पेश की और शिया-सुन्नी दोनों समुदायों ने इस का स्वागत किया था। इस्लामी इंक़ेलाब की कामयाबी के फ़ौरन बाद इस्लामी इंक़ेलाब के संस्थापक इमाम ख़ुमैनी के उपाय से "एकता सप्ताह" को आधिकारिक हैसियत हासिल हुयी। अल्लाह के करम से मुसलमान क़ौमों के दरमियान एकता का एक सफल नमूना ईरानी क़ौम में पाया जाता है और दुश्मनों की साज़िशें उसे नुक़सान पहुंचाने में कोई ख़ास कामयाब नहीं रही हैं।
फिर भी दुश्मन हमेशा इस अज़ीम नेमत को नुक़सान पहुंचाने की घात में लगे रहते हैं। जो चीज़ उनमें उम्मीद पैदा करती है वह मतभेदों को बढ़ा चढ़ाकर पेश करना है। अक़ीदे और धार्मिक मतभेद अगरचे इस्लाम के दुश्मन के लक्ष्यों का एक अहम पहलू हैं और वह इनसे फ़ायदा उठाने के सिलसिले में बहुत आशावान भी है लेकिन वह इसी पर संतोष नहीं करेगा बल्कि कोशिश करेगा कि नस्ली, सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और भौगोलिक स्वभाव के तमाम मतभेदों को ईरान और किसी भी दूसरे इस्लामी मुल्क में मुसलमान अवाम के दरमियान फूट डालने का बहाना बना दे ताकि उसके ज़रिए इस्लामी जगत के टुकड़े टुकड़े होने और उसकी ताक़त के नष्ट होने के मंज़र देखे और उचित मौक़े पर उन पर अपना वर्चस्व स्थापित कर ले। इन मामलों के सिलसिले में क़ुरआने मजीद का हुक्म इस आयत में बयान हुआ हैः "और आपस में झगड़ा न करो वरना कमज़ोर पड़ जाओगे और तुम्हारी हवा उखड़ जाएगी।" (सूरए अनफ़ाल, आयत-46) इसलिए जो भी जिस पोज़ीशन पर भी मुसलमानों के बीच फूट डालने वाला कोई कृत्य करे और मुसलमान समाज में मतभेद पैदा करे, वह जानबूझ कर या अनजाने तौर पर और इरादे के तहत या बिना इरादे के, इस्लाम के दुश्मनों के हितों को पूरा करेगा। और आज के दौर में कोई भी किस तरह ऐसे अमल को अपनी जेहालत और ग़फ़लत का नतीजा बता सकता है जबकि आज दुनिया के सरकशों और उन में सबसे ऊपर अमरीका ने अपने साम्राज्यवादी लक्ष्य और अपनी साम्राज्यवादी साज़िशों के घिनौने चेहरे से खोखले और मक्कारी भरे मुखौटे को हटा दिया है और धोखा देने वाले मख़मली दस्ताने उतारकर अपने ख़ूंख़ार पंजे पूरी दुनिया को दिखा दिए हैं?
अब वक़्त आ गया है कि मुसलमान ग़ौर व फ़िक्र करे और घटनाओं को ज़्यादा गहरी नज़र से देखे। अगर मुसलमान एक एकजुट ताक़त होते, अपनी मुट्ठी को मज़बूती से भींचते तो क्या फ़िलिस्तीनी क़ौम इस तरह असहाय होकर क़ाबिज़ों के ज़ुल्म व सितम का निशाना बनती? और अगर आज फ़ार्स खाड़ी के तटवर्ती मुल्क की क़ौमें और सरकारें इस्लाम के परचम तले अपनी एकता को क़ायम कर लेतीं तो क्या यह भ्रष्ट और ग़ुंडे हज़ारों किलोमीटर दूर से उनकी सरज़मीनों और संपत्तियों पर ललचायी नज़र रखने की हिम्मत कर सकते थे?
इस्लामी मुल्कों के शासकों ख़ास तौर पर पश्चिम एशिया के क्षेत्र और फ़ार्स खाड़ी के तटवर्ती मुल्कों के शासकों को मेरी बार बार पुरज़ोर नसीहत यह है कि अपने वास्तविक दुश्मन को पहचानिए, उसकी साज़िश को समझकर उसका मुक़ाबला कीजिए। इस्लामी उम्मत के मसलों का हल एकता और नेकी व भलाई की राह में दोस्ती और सहयोग है। अमरीका के अपराधी शासक और अवैध ज़ायोनी शासन इस एकता और दोस्ती के कट्टर दुश्मन हैं। वो सिर्फ़ इस्लामी गणराज्य ईरान, ईरानी क़ौम और महान इस्लामी रेज़िस्टेंस मोर्चे के दुश्मन नहीं हैं बल्कि पूरी इस्लामी उम्मत ख़ास तौर पर वेस्ट एशिया और उत्तरी अफ़्रीक़ा की क़ौमों के दुश्मन हैं और इस मामले में इन मुल्कों के शासक भी, जिन में से बहुत से उनके सहायकों में शुमार होते हैं, इससे अपवाद नहीं हैं, जैसा कि साम्राज्यवादी ताक़तों के सरग़नाओं की ओर से कुछ इस्लामी मुल्कों के राष्ट्राध्यक्षों की खुल्लम खुल्ला तौहीन और उनके बारे में अनुचित शब्दों का इस्तेमाल हमको और आपको याद है।
मतभेद से दूरी और एकता का अहम सबक़, दुश्मन और दोस्त का सामना करने के बारे में इस्लामी मत का पहला सबक़ है जबकि उसका दूसरा सबक़ कुफ़्र के मुक़ाबले में एक दूसरे का बचाव और तीसरा सबक़ मुसलमानों की भौतिक और आध्यात्मिक ज़िंदगी के मुख़्तलिफ़ मामलों, यानी दौलत, सुरक्षा, इल्म और तरक़्क़ी के क्षेत्र में मुख़्तलिफ़ तरह के सहयोग और आपसी ताक़त में इज़ाफ़ा करना है और सफ़र की अस्ल मंज़िल नई इस्लामी सभ्यता तक पहुंच होगी। इसलिए मुसलमानों के दरमियान एकता, अज़ीज़ और प्रभुत्वशाली सभ्यता की स्थापना की आधारशिला है। यह वैचारिक व सैद्धांतिक पैकेज, जिसमें इस्लामी जगत के बारे में हमारी आरज़ू छिपी है, अज़ीज़ ईरान में स्वीकार्य हद तक व्यावहारिक रूप ले चुकी है और क़ौम के तमाम लोगों को इस सेवक की ओर से एक बार फिर यही नसीहत है कि हरगिज़ अपने दरमियान किसी भी मतभेद को जन्म लेने न दें।
आख़िर में मुझे उम्मीद है कि पैग़म्बरे इस्लाम और उनकी पाकीज़ा इतरत की, उन सब पर अल्लाह का दुरूद व सलाम हो, शिफ़ाअत से अल्लाह की रहमत व बर्कत का साया इस्लामी समाजों को अपनी छांव में ले लेगा और मुसलमान अल्लाह के आदेशों पर अमल के साए में दिन ब दिन ज़्यादा से ज़्यादा तरक़्क़ी व इज़्ज़त की राह तय करेंगे।
आप सब पर सलाम और अल्लाह की रहमत व बर्कत हो।
सैयद मुज्तबा हुसैनी ख़ामेनेई
17 रबीउल अव्वल 1448 हिजरी मुताबिक़ 30 अगस्त 2026