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पाकीज़ा रक्षा सप्ताह और शहीद हसन नसरुल्लाह की शहादत की दूसरी बरसी के मौक़े पर इस्लामी इंक़ेलाब के नेताः

वह मुल्क जिसके अवाम सत्य को क़ायम करने में निडर हैं, अल्लाह के हिसाब के मुताबिक़, दुनिया की पहली ताक़त है

इस्लामी इंक़ेलाब के रहबर आयतुल्लाह सैयद मुज्तबा हुसैनी ख़ामेनेई ने पाकीज़ा रक्षा सप्ताह और शहीद सैयद हसन नसरुल्लाह की शहादत की दूसरी बरसी के मौक़े पर अपने पैग़ाम में बल देकर कहा कि ईरान के अज़ीज़ अवाम के सेवक की हैसियत से मैं एलान करता हूं कि वह पिछला दौर, जिस में हमारे वापस जाने का हमारा दुश्मन इच्छुक है, गुज़र चुका है और अब कभी वापस नहीं आएगा।


इस्लामी इंक़ेलाब के नेता का पैग़ाम इस प्रकार हैः


बिस्मिल्लाह अर्रहमान अर्रहीम


"और बेशक हम ने मूसा को अपनी निशानियों के साथ भेजा था (और हुक्म दिया) कि अपनी क़ौम को (कुफ़्र के) अंधेरों से निकाल कर (ईमान की) रौशनी में लाओ और उन्हें अल्लाह के मख़सूस दिन याद दिलाओ।" (सूरए इब्राहीम, आयत-5)
मेहर (ईरानी कैलेंडर का सातवां महीना जो 21 सितम्बर-19 अक्तूबर) के महीने के आरंभिक दिन, "अय्यामुल्लाह" और पहली थोपी गयी जंग में ईरानी क़ौम की 8 वर्षीय बहादुरी भरी प्रतिरक्षा की महान व अमर दास्तान की याद दिलाते हैं। उन दिनों ईरान की सरज़मीन पर इंक़ेलाब के सूरज की किरनें राष्ट्रीय एकता और इस्लामी इंक़ेलाब के मत से वफ़ादारी का एक मधुर एहसास फैला रही थीं, जिसके असर से वर्चस्ववाद और पुराने और नए साम्राज्यवाद का रोब और दबदबा ख़त्म हो रहा था। उन दिनों ईरान के कुछ लोगों के दिमाग़ में उससे पच्चीस साल पहले के साम्राज्यवादी पिट्ठुओं की बुरी नीयत, तेल उद्योग के राष्ट्रीयकरण से संबंधित वाक़यों और अमरीका द्वारा कराए गए विद्रोह की यादें सुरक्षित थीं। कुछ दूसरों ने इन वाक़यों की ख़बरें सुनी थीं और उन में से बहुत से लोगों ने इस हक़ीक़त को अच्छी तरह महसूस किया था कि मुल्क के मामलों पर ग़ैरों के वर्चस्व ने उसके साथ क्या किया था। फिर भी उससे पहले के दिन काले और अंधकारमय थे, जब साम्राज्यवादी सरकारों के दूत, मुल्क के शाह को निर्देश दिया करते थे और वह भी रज़ामंदी और रूचि या बेदिली से उन पर अमल करता था, यहाँ तक कि इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह के नेतृत्व में ईरान की महान क़ौम के इंक़ेलाब ने उस बिसात को उलट लिया। इस इंक़ेलाब के नतीजे में वो अंधकारमय दिन इस्लामी गणराज्य के प्रकाशमान दिनों में बदल गए। यह चीज़ उन वर्चस्ववादियों को बहुत बुरी लगी जिनकी नज़रें इस सरज़मीन की दौलत व संपत्ति पर लगी हुयी थीं और जो बरसों से उसे अपने क़ब्ज़े में लेने के लिए उसके अवाम पर हर तरह का ज़ुल्म करते आए थे। उसके बाद उन्होंने इंक़ेलाबी क़ौम के दरिया के तेज़ बहाव को पीछे की दिशा में वापस मोड़ने के लिए अपनी पूरी ताक़त लगा दी और पहली थोपी गयी जंग, इस्लामी गणराज्य की मुबारक ज़िंदगी के पहले दशक में उन की सबसे अहम कार्रवाई थी।

उस जंग की आग से, जो अवाम की दुश्मन बास पार्टी के हाथों, कुछ दिनों की जंग और आसानी से हासिल होने वाली फ़तह के वहम के साथ भड़काई गयी थी, इस्लामी सिस्टम पहले से ज़्यादा फलदायक और ताक़तवर होकर उभरा और बाज़ की तरह पहले से ज़्यादा ऊंची आवाज़ और ऊंची उड़ान के साथ उठ खड़ा हुआ और दुश्मन की ओर से बाद में पैदा की गयी बाद की हर घटना में भी इस सिस्टम की निरंतर यही ख़ुसूसियत रही।

वो दिन, जब इस क़ौम के दुश्मन ने अपने पिट्ठुओं को उस पर थोप रखा था और एक नए अंदाज़ में उपनिवेशिक योजना लागू कर रहा था, इंक़ेलाब और थोपी गयी जंग के मोर्चे से इस्लाम और जेहाद का परचम फहराने की बर्कत से, ऐसे गौरवशाली दिनों में बदल गए कि 38 साल गुज़रने के बावजूद उनके एक एक वाक़ए और उन में शामिल लोगों की सच्ची रवायतों को देखने से ऐसे अनमोल नमूने सामने आते हैं जो इबादत, बहादुरी, दृढ़ता, नैतिकता और इंसानियत का सबक़ देते हैं और हमारे मुल्क के इतिहास के माथे पर रौशन सितारों की तरह जगमगा रहे हैं।

वो दिन कि जब वर्चस्ववादी सिस्टम के पिट्ठुओं के हमलों के आग़ाज़ में हमारे मुल्क के पास बहुत से ख़तरों से अपनी रक्षा के लिए, सरकश सिस्टम से विरासत में मिलने वाले ख़ाली हाथों के अलावा कुछ नहीं था, सत्य को क़ायम करने और अल्लाह की मदद की बरकत से अब ऐसे दिनो में बदल चुके हैं कि अब आक्रांता ताक़तों के पिट्ठू नहीं बल्कि ख़ुद आक्रांता ताक़तें, इस्लाम के मुजाहिदों के हमलों से बचने के लिए छिपने की जगह तलाश करती हैं और जंग ख़त्म करने के लिए हाथ इल्तेजाएं करती हैं।

वो दिन जिनकी तरफ़ वो हमारे मुल्क को वापस ले जाने की इच्छा रखते हैं, पिछड़ापन, अपमान, रुसवाई, मोहताजी और इस्लामी दुनिया में ईरान की बदनामी से भरे हुए थे और ये दिन जिन में हम ज़िंदगी गुज़ार रहे हैं, तरक़्क़ी, इज़्ज़त, संप्रभुता और इस्लामी दुनिया ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में गौरव और प्रतिष्ठा के चोटी पर होने के दिन हैं। आज कुछ लोग हमें दुनिया की चौथी सुपर पावर समझते हैं। अलबत्ता वो दुनिया के हिसाब किताब की बुनियाद पर ऐसा कहते हैं लेकिन अल्लाह के हिसाब किताब के मुताबिक़ वह मुल्क जो ख़ुद को पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों से सलवातुल्लाह व सलामोहू अलैहिम जुड़ा हुआ समझता है, जिस के ज़्यादातर लोग इन महान हस्तियों से दिली लगाव रखते हैं और सत्य की स्थापना के लिए किसी ख़ौफ़ का शिकार नहीं हैं, दुनिया की पहली ताक़त है।

उस वक़्त ईरान के दो दक्षिणी समुद्री इलाक़े, दुश्मन के हमलों की ज़द पर थे लेकिन आज वो, बहादुर मुजाहिदों और होर्मुज़ जलडमरूमध्य के रक्षकों के घातक हमले की वजह से अरब सागर से आगे नहीं बढ़ते और जब भी उन्होंने यह ख़तरा मोल लिया, ख़ुद को नुक़सान पहुंचाया और जल्द ही अरब सागर भी उन को निकाल बाहर करेगा।

कभी ऐसे दिन भी थे जब वर्चस्ववादी ताक़तों ने मनोवैज्ञानिक कार्रवाइयों के ज़रिए और डर का माहौल पैदा करके राजधानी की सड़कों को सुनसान कर दिया था और इस क़ौम की आज़ादी की भावना के ख़िलाफ़ बग़ावत पैदा की और उसके बाद 25 साल तक इस मुल्क की दौलत लूटती रहीं लेकिन इन दिनों 7 महीने से हमारे हमवतन पूरे मुल्क में चौक-चौराहों और सड़कों को अपनी ज़िम्मेदारी भरी और पुरजोश मौजूदगी से सुशोभित कर रहे हैं ताकि इस्लाम के मुजाहिदों के हौसले बुलंद रहें और दुश्मन पर डर छाया रहे। इसी तरह 3 करोड़ से ज़्यादा ईरानियों ने वतन पर अपनी जान न्योछावर करने का एलान किया और जब उन्हें सुव्यवस्थित करने के लिए दावत दी गयी तो सिर्फ़ आरंभिक 100 मिनट में ही 5 लाख से ज़्यादा लोगों ने वांछित गुंजाइश पूरी कर दी। इस वक़्त पूरे इस्लामी ईरान में, जो मुख़्तलिफ़ क़ौमों पर आधारित ईरानियों की मौजूदगी से सजा हुआ है, मुख़्तलिफ़ तरह की तैयारी, ख़ास तौर पर सशस्त्र कार्रवाई की तैयारियां जारी हैं ताकि लड़ाई का ऐसा मैदान बनाया जाए जो ईरानी अवाम को सम्मान और इज़्ज़त और दुश्मन को रुसवाई और अपमान दे। 
ऐसे दिन भी थे जब इस सरज़मीन के लोगों की बहादुरी और दिलेरी, उसके मर्दों से पहचानी जाती थी लेकिन अब हम ऐसे दिनों में हैं कि कुछ मैदानों में महिलाएं अपनी बहादुरी भरी मौजूदगी से मर्दों से आगे निकल रही हैं।

ऐसे दिन भी थे जब दुश्मन ने मुसलसल कोशिश की थी कि सिस्टम के सामाजिक सपोर्ट को कम से कम कर दे लेकिन इन दिनों समाज के मुख़्तलिफ़ वर्ग, मतभेदों के बावजूद बर्कत से मालामाल होर्मुज़ जलडमरूमध्य को कंट्रोल में रखने सहित अपने सही स्टैंड पर डटे हुए हैं।

अतीत के दिनों और मौजूदा दिनों के दरमियान इस तुलना को फैलाया जा सकता है लेकिन एक जुमले में, ईरान के अज़ीज़ अवाम के सेवक की हैसियत से मैं एलान करता हूं कि वह अतीत का दौर, जिस में हमारे वापस जाने का हमारा दुश्मन इच्छुक है, गुज़र चुका है और अब कभी वापस नहीं आएगा। अलबत्ता मुझे दर्द के साथ याददेहानी करानी चाहिए कि इन दिनों महान ख़ुमैनी और महान शहीद ख़ामेनेई (अल्लाह उनके दर्जे बुलंद करे) की जगह बहुत ख़ाली है, आज मुल्क की इज़्ज़त उनके नेतृत्व की ऋणी है। फिर भी उनके शानदार और मार्गदर्शक मूल्यवान विचारों के ख़ज़ाने की बर्कत से, जो उनके अनुयाइयों के लिए छोड़ा गया है, आने वाले दिन, इन दिनों से ज़्यादा भव्य होंगे। इसलिए कि वो बाज़ जो पहली थोपी गयी जंग की आग से निकला था, अब दुश्मन के दबाव और ख़ास तौर पर हालिय दो थोपी गयी जंगों के नतीजे में इस क़द्र बड़ा हो चुका है कि उसकी उड़ान का साया दुश्मन की सरज़मीनों पर भी पड़ चुका है।

इस मौक़े पर अरब दुनिया के महानायक और रेज़िस्टेंस मोर्चे के महान आदर्श, शहीद जनाब सैयद हसन नसरुल्लाह (अल्लाह उनके पाकीज़ा नफ़्स की महानता बढ़ाए) की शहादत की दूसरी बरसी के मौक़े पर उनका ज़िक्र करना बिल्कुल उचित है। वह शख़्स जो अपनी क़ौम और अपने मत के लिए एक सच्चा शुभचिंतक था और जिसके सच्चे और मधुर भाषण और उसकी बहादुरी भरी कार्रवाई उस के लोगों बल्कि दुनिया के आज़ाद इंसानों के दिलों को मज़बूत करती थी। वह शख़्स जिसने लेबनान के नाम को, जो एक छोटा सा मुल्क है और बरसों तक कुछ बड़ी ताक़तों का आंगन बना हुआ था, महानता के साथ बुलंदियों तक पहुंचाया। वह शख़्स जिसके हमेशा के साथी मदद और फ़तह थे और वह शख़्स कि उसकी जैसी महानता रखने वाला कोई मर्द, पैग़म्बरों और उनके उत्तराधिकारियों के बाद, सीरिया के क्षेत्र के प्राचीन इलाक़े के पूरे इतिहास में अब तक पैदा नही हुआ था। और अब उसका गौरवशाली परचम जनाब शैख़ नईम क़ासिम (अल्लाह उनकी रक्षा करे) के हाथों में है, जो पूरी बहादुरी से हिज़्बुल्लाह की मज़बूत और आशूरा जैसी पंक्तियों में आगे आगे रहते हुए उसके मिशन को जारी रखे हुए हैं।

लेबनान के ये दिन इतिहास में बल्कि इसी वक़्त से, उनके लिए और रेज़िस्टेंस के तमाम मुजाहिदों के लिए नुमायां और गौरवशाली दिन हैं और उन लोगों के लिए अपमान और रुसवाई पैदा करने वाले और शर्मिंदा करने वाले दिन हैं, जो ज़ायोनी दुश्मन के सामने, अपने वर्चस्व जमाने वाले आक़ाओं और बुरा चाहने वालों के झूठे वादों से उम्मीद लगाए बैठे हैं। वो लोग, रेज़िस्टेंस के शहीद सैयद और सैयद हाशिम सफ़ीउद्दीन और रेज़िस्टेंस के मौजूदा मुजाहिदों के बरख़िलाफ़, जो ज़माने के साथ प्रकाशमान सितारों की तरह चमकेंगे और भटके हुए लोगों का मार्गदर्शन करेंगे, इतिहास के पहले ही पन्ने में बहुत जल्द दफ़्न हो जाएंगे और भुला दिए जाएंगे और जब भी भविष्य में उनका नाम आएगा तो बुराई, ग़लत उपाय और शायद ग़द्दारी करने वालों के तौर पर आएगा।

आख़िर में उम्मीद करता हूं कि अल्लाह की निरंतर कृपा और हमारे सरपरस्त हज़रत इमाम महदी, अल्लाह उन्हें जल्द ज़ाहिर करे और हमारी जानें उन पर क़ुर्बान, की विशेष दुआ के जारी रहने के साथ ही, ईरानी क़ौम और रेज़िस्टेंस के तमाम साथियों का सामना मदद, फ़तह और इज़्ज़त के सिवा किसी चीज़ से न हो और उनके दुश्मनों को हार और रुसवाई के सिवा किसी चीज़ का मुंह देखना नसीब न हो, अल्लाह की कृपा और उसकी मेहरबानी से।

सैयद मुज्तबा हुसैनी ख़ामेनेई 
28 सितम्बर 2026