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इस्लामी इंक़ेलाब के सर्वोच्च नेता का नमाज़ की राष्ट्रीय कॉन्फ़्रेंस के नाम पैग़ाम में नमाज़ क़ायम करने पर बल

इस्लामी इंक़ेलाब के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह सैयद मुज्तबा हुसैनी ख़ामेनेई ने गुरूवार के दिन नमाज़ की राष्ट्रीय कॉन्फ़्रेंस के नाम अपने पैग़ाम में नमाज़ क़ायम करने पर बल दिया।

 इस्लामी इंक़ेलाब के सर्वोच्च का पैग़ाम इस प्रकार हैः
बिस्मिल्लाह अर्रहमान अर्रहीम
"नमाज़ क़ायम करने" के अनमोल विषय पर ध्यान और विशेष तौर पर नमाज़ की राष्ट्रीय कॉन्फ़्रेंस का आयोजन उन ज़रूरी और अनिवार्य कामों में से है, जो 1990 के दशक के आग़ाज़ में मुल्क में मुजाहिद और जन-धर्मगुरू, क़ुरआन के टीचर और मशहूर प्रवचनकर्ता हुज्जतुल इस्लाम वलमुस्लेमीन क़ेराअती की कोशिशों से शुरू हुआ। इस मामले पर महान शहीद -अल्लाह उनके दर्जे बुलंद करे- की ओर से विशेष ध्यान और पिछली 32 कॉन्फ़्रेंसों से संबंधित उनके पैग़ामों में दिए गए अहम, निरंतर और ताकीद के साथ निर्देश भी इस नीति की अहमियत को बढ़ाते हैं। इस बात में शक नहीं कि नमाज़ के बारे में बातचीत या लिखित बातें, अल्लाह की वहि और पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम और उनके पवित्र परिजनों के कथनों के मरतबे के मुताबिक़ है और मुझ जैसे शख़्स का क़लम इससे कहीं छोटा है कि नमाज़ की मारेफ़तों की गहराई के बारे में कुछ लिख सके। फिर भी इस्लामी समाज की पहचान और ज़रूरतों तथा उसके सेवकों ख़ास तौर पर इस्लामी इंक़ेलाब के नेतृत्व के फ़रीज़े का तक़ाज़ा है कि इस सिलसिले में कुछ वाक्य अपने आपकी, एक एक शख़्स की और अधिकारियों की याददेहानी के लिए लिखूं। 

नमाज़, अल्लाह की अज़ीम और सबसे ख़ूबसूरत नेमतों में से एक, धर्म का सबसे अहम पहलू, प्रतीक और स्तंभ और हम में से हर एक के लिए असीमित और कभी ख़त्म न होने वाले पाकीज़ा इलाही स्रोत से निकटता और सीधे संबंध का साधन है। सौभाग्य प्राप्ति का यह अमृत और पाकीज़ा ज़िंदगी का यह स्तंभ शैतानी इच्छाओं और सांसारिक शैतानों के ख़िलाफ़ इंसान के संघर्ष में एक मज़बूत और स्थायी सहारा और कभी ख़त्म न होने वाला ज़ख़ीरा भी है तथा इश्क़, उम्मीद, मेहरबानी और सुकून का उबलता हुआ सोता भी है। नमाज़ क़ायम करने और इस्तेग़फ़ार के ज़रिए अल्लाह की बरकतें उतरती हैं और रोज़ी बढ़ती है।

नमाज़ का फ़रीज़ा सिर्फ़ एक व्यक्तिगत ज़िम्मेदारी नहीं है और क़ुरआन की शिक्षाओं के मुताबिक़, नमाज़ क़ायम करना नेक बंदों के शासन का पहला फल और चिन्ह हैः "ये वो लोग हैं कि अगर हम उन्हें ज़मीन में इक़्तेदार अता करें तो वो नमाज़ क़ायम करेंगे।" (सूरए हज, आयत-41) इस आयत का, हज नामक मुबारक सूरे में अल्लाह के दोस्तों और उनके जेहाद के बारे में अल्लाह की मदद के वादे की आयत के फ़ौरन बाद आना, यह बताता है कि अल्लाह के ज़िक्र और उस पर उम्मीद व भरोसे के मज़बूत सहारे के तौर पर नमाज़ का क़ायम किया जाना मुक़ाबले के मैदानों में जेहाद और फ़तह में रोल रखता है, ख़ास तौर पर इस संघर्ष के मैदान में जो आज ईरान की क़ौम के सामने हैं।

आज जब अज़ीज़ ईरानी अवाम के प्रभुत्व व इक़्तेदार के अनुकूल हालात पहले से ज़्यादा मुहैया हो चुके हैं तो क़ौम का हर शख़्स नमाज़ को क़ायम करने के बार बार दोहराए जाने वाले अल्लाह के इस हुक्म के संबोधन के दायरे में आता हैः "नमाज़ क़ायम करो।" इसके अलावा समाज में प्रभावी तमाम लोग, माँ बाप और परिवारों से लेकर टीचरों और दोस्तों तक, शिक्षकों और असाधारण सलाहियत वाले लोगों से लेकर मशहूर शख़्सियतों और मशहूर लोगों तक इसी तरह इस संस्कृति को प्रचलित करने वाले विभागों और सेंटरों तक की इस मामले में दोहरी ज़िम्मेदारी है, जिन में मस्जिदें, जुमे की नमाज़, स्कूल, यूनिवर्सिटियां, उच्च स्तरीय धार्मिक शिक्षा केन्द्र, रेडियो और टेलीविजन विभाग, सांस्कृतिक और सामाजिक कार्यकर्ता और स्वयंसेवी शामिल हैं, ख़ास तौर पर वो लोग और वो विभाग जो किशोरों और नौजवानों से संपर्क में हैं।
 
शुद्ध मोहम्मदी इस्लाम का परचम फहराने और इस्लामी शासन पर गर्व करने वाले समाज और मुल्क में नमाज़ को उसके तमाम चरणों और उत्थान के स्तरों के साथ क़ायम करना, सबसे अहम मामलों में शामिल हैं और अभियान तथा इस्लामी इंक़ेलाब के चरण से इस्लामी समाज के गठन के चरण तक के सफ़र की राह समतल करने के लिए ज़रूरी काम है कि जिसके बाद ही इस्लामी सभ्यता के चरण तक पहुंचना मुमकिन होगा। नमाज़ का हर स्तर पर चलन, इसका व्यापक होना और फिर सार्वजनिक स्तर पर अच्छी तरह अंजाम देने की कोशिश, इस अहम लक्ष्य तक पहुंचने की जिद्दो जेहद के दो बुनियादी पहलू हैं और मस्जिदों का नमाज़ियों से भरा रहना और जमाअत और जुमे की नमाज़ों की तादाद का बढ़ना और उसके ज़ाहिरी रूप को बेहतर बनाने के लिए दूसरे काम, इस लक्ष्य को हासिल करने की ज़रूरी पृष्ठिभूमियां हैं। इन तमाम मामलों में जमाअत की नमाज़ और जुमे की नमाज़ के इमाम का रोल बहुत अहम है, जिन्हें अवाम के लिए शरणस्थल, उनकी बात सुनने वाला और उनके दर्दे दिल को शांत करने वाला होना चाहिए। 

मुझे उम्मीद है कि महान अल्लाह की क़पा और हमारे सरपरस्त हज़रत इमाम महदी अलैहिस्सलाम -अल्लाह उन्हें जल्द से जल्द ज़ाहिर करे- की विशेष तवज्जो और दुआ से हमारी अज़ीज़ क़ौम और हमारा मुल्क नमाज़ क़ायम करने और उसकी बर्कतों से लाभान्वित होने में कामयाब होगा। 

सैयद मुज्तबा हुसैनी ख़ामेनेई
1 अक्तूबर 2026