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विदेशी वर्चस्व से फ़ैसलों में स्वाधीनता तक

"उन दिनों और इन दिनों" का ईरान

इस्लामी इंक़ेलाब के बाद, ईरान के नेताओं द्वारा, मुल्क के इतिहास की अहम घटनाओं पर बयान जारी होते रहे हैँ। जिनमें इस्लामी इंक़ेलाब के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह सैयद मुज्तबा ख़ामेनेई का 28 सितम्बर 2026 का ताज़ा बयान है जो उनकी ओर से ईरान पर सन 1980 में इराक़ द्वारा थोपी गयी जंग की बरसी के मौक़े पर जारी हुआ। यह बयान, कार्य प्रणाली (मेथडालजी) और विश्लेषणात्मक प्रणाली सहित मुख़्तलिफ़ आयाम से समीक्षा योग्य है।

इस बयान में ऐतिहासिक-तुलनात्मक पद्धति का सहारा लिया गया है; ऐसी पद्धति जिस में समाज या घटनाओं के दो या कई दौर की तुलना की जाती है ताकि अंतर और समानताएं, कारण और उसके अंजाम स्पष्ट हो जाएं। इस्लामी इंक़ेलाब के बयान में, यह तुलना उन दिनों और इन दिनों जैसी शब्दावली के सांचे में साफ़ तौर पर देखी जा सकती हैः इस्लामी इंक़ेलाब से पहले और बाद की सैन्य क्षमता, कैस्पियन सी और फ़ार्स खाड़ी में ईरान भूराजनैतिक स्थिति, राजनैतिक स्वाधीनता और निर्भरता, आज के ईरान में अवाम की सामाजिक भूमिका के मुक़ाबले में विगत में उनके कमज़ोर होने तथा उनके कोई रोल न होने और इन दोनों दौर में ईरानी महिला की स्थिति की तुलना।

उन दिनों
ईरानी अवाम को अपने समकालीन इतिहास में ख़ास तौर पर क़ाजारी और पहलवी शासन काल में मुल्क में विदेशी ताक़तों के हस्तक्षेप और इस मुल्क की राजनैतिक स्वाधीनता के सीमित होने का कड़वा अनुभव रहा है। रूस और ब्रिटेन के बीच प्रतिस्पर्धा और असंतुलित समझौतों के ज़रिए उनके हस्तक्षेप, आर्थिक छूट और आंतरिक फ़ैसलों को प्रभावित किए जाने से ईरान की राष्ट्रीय संप्रभुता का दायरा सीमित हो गया था। 


इस्लामी इंक़ेलाब के सर्वोच्च नेता उस दौर के बारे में कहते हैं, "बहुत से लोगों ने इस हक़ीक़त को अच्छी तरह महसूस किया था कि मुल्क के मामलों पर ग़ैरों के वर्चस्व ने उसके साथ क्या किया था। फिर भी उससे पहले के दिन काले और अंधकारमय थे, जब साम्राज्यवादी सरकारों के दूत, मुल्क के शाह को निर्देश दिया करते थे और वह भी रज़ामंदी और रूचि या बेदिली से उन पर अमल करता था।"


यह हस्तक्षेप पहलवी दौर में भी जारी रहा और इस शासन की स्थापना, उसके जारी रहने और उसके भविष्य के निर्धारण और इसी तरह बड़े राजनैतिक फ़ैसलों में बड़ी ताक़तों ख़ास तौर पर ब्रिटेन और अमरीका का निर्णायक रोल था।

पहलवी शासन की स्थापना और विदेशी ताक़तों का रोल
ईरान के राजनैतिक इतिहास में पहलवी दौर इस लेहाज़ से अलग है कि पिछले शासनों के विपरीत जो मुख्य रूप से आंतरिक फ़ोर्सेज़ और कलह की वजह से वजूद में आए थे, पहलवी शासन विदेशी खिलाड़ियों के सीधे हस्तक्षेप से वजूद में आया था। फ़रवरी 1921 के सैन्य विद्रोह और उसमें ब्रिटेन के रोल के बारे में अनेक ऐतिहासिक स्रोत मौजूद हैं। मिसाल के तौर पर महमूद तुलूई लिखते हैं, "ब्रिटेन सैन्य विद्रोह कराने के लिए कुछ लोगों से संपर्क में था जिनमें "कज़्ज़ाक़ डिवीजन का प्रमुख जनरल हुमायूं", "अब्दुल्लाह ख़ान तहमासबी" और "रज़ा ख़ान अमीर पंजे माज़न्दरानी" शामिल थे। सैन्य विद्रोह के लिए रज़ा ख़ान के साथ बातचीत नतीजे तक पहुंची।"1


यरवान्द आब्राहामियान के मुताबिक़, "रज़ा ख़ान ने तेहरान की ओर बढ़ने से पहले, क़ज़वीन में ब्रितानी अफ़सरों से संभवतः मशविरा किया था और उनसे अपने लोगों के लिए गोला बारूद, खाद्य पदार्थ और तनख़ाह ली।"2


मलिकुश शोअरा बहार, रज़ा ख़ान किस तरह सत्ता में पहुंचा, इस बारे में लिखते हैं, "रज़ा ख़ान मीर पंजे को, जो क़ज़्ज़ाक़ अफ़सरों में था, आयरनसाइड (ईरान में तत्कालीन ब्रिटिश कमांडर) की मदद से क़ज़्ज़ाक़ों (ईरान में एकमात्र सैन्य बल) का कमांडर चुना गया और आयरनसाइड के सुझाव पर सैयद ज़ियाउद्दीन तबातबाई के साथ, ताक़तवर सरकार के गठन के लिए तेहरान रवाना हुआ। तेहरान अपनी फ़ोर्सेज़ के साथ, उस गिरोह के कंट्रोल में आ गया जिसने ख़ुद को बेच दिया था।"3


दूसरे विश्व युद्ध के दौरान ईरान पर क़ब्ज़े के बाद पूर्व सोवियत संघ, अमरीका और ब्रिटेन के हितों के आपस में मिलने से मुल्क का राजनैतिक भविष्य तय हुआ। रज़ा ख़ान मुल्क से बाहर हुआ और मोहम्मद रज़ा पहलवी अलाइड फ़ोर्सेज़ के समर्थन से सत्ता पर बैठा। 


फ़ील्ड मार्शल फ़िरदूस्त की डायरी भी मोहम्मद रज़ा पहलवी के भविष्य में रोल के निर्धारण में ब्रिटिश अधिकारियों के रोल को स्पष्ट करती है। वह रज़ा ख़ान के शासन अंतिम कुछ हफ़्तों और युवराज के साथ अपने संबंधों के बारे में लिखता है, "रज़ा ख़ान के शासन के आख़िरी दो हफ़्तों में, मैं ऐसे मामलों में व्यस्त था जिसका पहलवी शासन के अगले अंजाम के निर्धारण में निश्चित रूप से प्रभाव था। युवराज से मेरी निकटता और उसकी मुझसे अतुल्य दोस्ती इस बात का सबब बनी कि इस संवेदनशील चरण में मैं ब्रिटिश सूचना अधिकारी से उसका संपर्क क़ायम करने वाले का रोल अदा करूं। इन दिनों सिर्फ़ मैं मोहम्मद रज़ा का घनिष्ठ और राज़दार दोस्त था...31 अगस्त या 1 सितम्बर को युवराज ने मुझसे कहा, "आज ब्रिटिश दूतावास से संपर्क करो। वहाँ ट्रॉट नाम का शख़्स है जो ईरान में ब्रितानी ख़ुफ़िया विभाग का प्रमुख और दूतावास का दूसरा सबसे बड़ा अधिकारी है। उसे सब पता है, उससे मेरी स्थिति के बारे में बात करो।"


मोहम्मद रज़ा, फ़िरदूस्त से उसी दिन संपर्क करने के लिए कहता है। फ़िरदूस्त ने ब्रितानी दूतावास से संपर्क किया और ट्रॉट ने उससे रात में क़ुलहक में दूतावास के क़रीब मुलाक़ात करने के लिए कहा। उस मुलाक़ात में फ़िरदूस्त ने अपना परिचय कराया और स्पष्ट किया कि युवराज ने उसे अपने भविष्य के बारे में पता करने के लिए भेजा है। ट्रॉट ने जवाब में मोहम्मद रज़ा को जर्मन लोगों का सपोर्टर बताया और कहा कि ब्रिटेन के पास, उसके व्यवहार के बारे में महल के भीतर से सूचनाएं और दस्तावेज़ हैं। फ़िरदूस्त ने सादाबाद लौट कर जो कुछ सुना था, मोहम्मद रज़ा को बताया।


फ़िरदूस्त आगे कहता है, "मैंने कहा, अगर वे ये बातें न जानें तो उनके होने का फ़ायदा क्या है? मोहम्मद रज़ा ने कहा, पक्की बात है यह काम नौकरों का है! मैंने कहा कि यह जिसने भी किया है, उसे छोड़ों, यह बताओ तुमने इससे क्या समझा? मोहम्मद रज़ा ने कहा, कल सुबह सवेरे ट्रॉट से संपर्क करो और उससे मुलाक़ात का वक़्त लो और कहा कि मैंने उसी रात मोहम्मद रज़ा से बात की, उसने कहा है कि नक़्शे को नष्ट कर दूंगा और रेडियो भी नहीं सुनूंगा मगर जिस रेडियो को सुनने की आप इजाज़त देंगे, उसे सुनूंगा।"


फ़िरदूस्त ने अगली रात ट्रॉट से फिर मुलाक़ात की और मोहम्मद रज़ा का संदेश उस तक पहुंचाया। ट्रॉट ने जवाब दिया, "ठीक है, देखते हैं कि क्या वह उपनी इस बात में सच्चा है या नहीं? मैंने कहा, मैं आपसे कब मिलूं? उसने कहा जब चाहो मिलो कल भी मिल सकते हो, लेकिन इस वक़्त सिर्फ़ यही जवाब है।"


इस मुलाक़ात के बाद, फ़िरदूस्त ने सारी बातें मोहम्मद रज़ा तक पहुंचायीं। उसके मुताबिक़, युवराज ने रेडियो सुनना छोड़ दिया और हुक्म दिया कि नक़्शा, रस्सी, पिन और उससे संबंधित सभी साधनों को हटा दिया जाए कि अब उसके कमरे में ये चीज़ें न रहें। मोहम्मद रज़ा ने जिसे अपने भविष्य के ओर से बड़ी चिंता थी, फ़िरदूस्त से कहा कि ट्रॉट से दोबारा संपर्क करे और उससे जल्द से जल्द उसके शासन के भविष्य की स्थिति को स्पष्ट करने के लिए कहे। उसे इस बात की चिंता सता रही थी कि कहीं ब्रिटिश, उसके भाई अली रज़ा को उसकी जगह न चुन लें।  


कुछ दिन बाद ट्रॉट ने फ़िरदूस्त को दोबारा बुलाया और मोहम्मद रज़ा के व्यवहार के बारे में कहा, "मोहम्मद रज़ा ने हमारे सुझाव पर अमल किया कि यह अच्छी बात है। अलबत्ता हम यह नहीं कह रहे हैं कि कोई रेडियो न सुने, जो रेडियो सुनना चाहे सुने लेकिन नक़्शे का मसला हमारे लिए अहम है कि यह कैसी रूचि है जो उसे जर्मन फ़ोर्सेज़ के आगे बढ़ने को लेकर थी।"4
यह वर्णन युवराज के साथ ब्रिटिश अधिकारियों के संपर्क का सिर्फ़ नमूना नहीं है, बल्कि ऐसी स्थिति का चित्रण है जिसमें शासन का भविष्य और अगले शासक का व्यवहार, एक विदेशी सरकार के सूचना अधिकारी की दख़लअंदाज़ी की ज़द पर था और वह उसकी समीक्षा कर रहा था।

बड़े फ़ैसलों में दूतावासों का प्रभाव
विदेशी हस्तक्षेप सिर्फ़ पहलवी शासन की स्थापना तक सीमित नहीं था, बल्कि उसके संचालन में भी था। ब्रितानी दूतावास ईरान के प्रधानमंत्रियों, मंत्रियों और वरिष्ठ अधिकारियों के चयन या उन्हें बर्ख़ास्त करने में भी रोल निभाता था और शाह भी ब्रितानी राजदूत से सलाह मशविरा करता था। तेल के राष्ट्रीयकरण से कुछ बरस पहले, विदेशी ताक़तों द्वारा मुसद्दिक़ की सरकार का विरोध और अपने मद्देनज़र विकल्पों का सपोर्ट किया जाना भी स्पष्ट था। 


पहलवी शासन के आख़िर के कुछ बरसों में अमरीका और ख़ास तौर पर ब्रिटेन के राजदूतों का रोल बहुत बढ़ गया था। तेहरान में अमरीका का आख़िरी राजदूत विलियम सैलिवान, शाह के अंजाम में बारे में रिपोर्ट देता हैः "जिस वक़्त शाह ने अपनी बात पूरी की, मैंने कहा कि मुझे आदेश है कि उससे आग्रह करूं कि मुल्क को फ़ौरन छोड़ दे।"5


जनरल रॉबर्ट हायज़र ने भी अपनी डायरी में शाह के निकलने के समय को लेकर अमरीकी अधिकारियों के बीच आपस में मतभेद के बारे में लिखा है, "शाह ने अपने जाने के बारे में हमारे विचार पूछे, सैलिवान ने कहा, जितनी जल्दी उतना बेहतर है! मैंने विरोध किया।...अलबत्ता हमारे बीच मतभेद उसके जाने के समय के संबंध में था। उसका ईरान में रहना, जनमत के बढ़ते क्रोध का निशाना बनने के लेहाज़ से, उलटा असर रखता।"6

19 अगस्त का सैन्य विद्रोह
विदेशी हस्तक्षेप के सबसे स्पष्ट नमूनों में से एक, 19 अगस्त 1953 का सैन्य विद्रोह और मोहम्मद मुसद्दिक़ की सरकार को गिराने के लिए अमरीका और ब्रिटेन के जासूसी तंत्र का संयुक्त ऑप्रेशन था। अमरीका के विदेश संबंध पर किताबों की श्रंख्ला सहित अमरीकी विदेश मंत्रालय द्वारा प्रकाशित दस्तावेज़ और जॉर्ज वॉशिंग्टन यूनिवर्सिटी के राष्ट्रीय सुरक्षा आर्काइव के डीक्सासिफ़ाइड दस्तावेज़ों ने इस ऑप्रेशन की योजना और उसे व्यावहारिक बनाए जाने का हवाला दिया है। 


इसलिए पश्चिमी रिसर्च स्कॉलर सहित अनेक रिसर्च स्कॉलर्ज़ ने, पहलवी शासन के ढांचे की व्याख्या के लिए 'निर्भरता' और 'पिट्ठू' जैसी शब्दावली का इस्तेमाल किया है। शापुर रवासानी ने "निर्भर सरकार", मार्क गाज़ियोरोस्की ने "अधीन सरकार" और जॉन फ़ूरान ने "पितृसत्तामकता सरकार" कहा है। ये दृष्टिकोण, वैचारिक अंतर के बावजूद, पहलवी सरकार के निर्भर ढांचे और विदेशी ताक़तों के हस्तक्षेप पर बल देते हैं।

इन दिनों
ईरान ने इस्लामी इंक़ेलाब के बाद, पहलवी शासन के विपरीत कि जिसमें विदेश नीति विदेशी ताक़तों के संतुलन और निर्भरता के परिप्रेक्ष्य में अपनायी जाती थी, अपनी विदेश नीति को 'स्वाधीन' रखा। राजनैतिक फ़ैसले ईरान के राष्ट्रीय हितों और सीमाओं के परिप्रेक्ष्य में होने लगे और राजनीति ने आंतरिक आयाम ले लिया। 


इन दिनों जब ट्रम्प ईरान से बिना शर्त सरेंडर की बात करता है तो उसके जवाब में ईरान के शहीद रहबर, इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के कथन का हवाला देते हैं, "ईरानी राष्ट्र, अपनी इस्लामी और शिया शिक्षाओं से अच्छी तरह अवगत है। वह जानता है कि उसे क्या करना चाहिए। इमाम हुसैन (अलैहिस्सलाम) ने फ़रमाया: "मेरे जैसा, यज़ीद जैसे की बैअत नहीं करता।" ईरानी राष्ट्र वास्तव में कह रहा है: हम जैसा राष्ट्र, संस्कृति वाला, चमकते अतीत वाला राष्ट्र, उच्च मान्यताओं वाला राष्ट्र, आज अमरीका में सत्ता पर क़ाबिज़ भ्रष्ट लोगों जैसे शासकों से कभी बैअत नहीं करेगा।"7


उन दिनों अमरीकी राजदूत शाह के लिए रहने या जाने के लिए फ़ैसला लेता था; इन दिनों ईरान के सर्वोच्च नेता अमरीकी राष्ट्रपति की धमकियों के मुक़ाबले में डट जाते हैं और मुल्क की स्वाधीनता की रक्षा करते हैं। जिस वक़्त तत्कालीन जापानी प्रधान मंत्री अमरीकी राष्ट्रपति का पैग़ाम ईरान लाते हैं, ईरान के रहबर का जवाब यह था, "मैं ट्रम्प को किसी पैग़ाम के आदान प्रदान के लायक़ नहीं समझता और उसके लिए कोई जवाब भी नहीं है और न ही दूंगा।"8
11 सितम्बर के बाद के हालात में तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज डबल्यू बुश ने बड़े घमंड से प्रिंट मीडिया को एक इंटरव्यू में कहा था, "आतंकवाद के ख़िलाफ़ जंग में ईरान हमारी मदद करे, आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई में हमारी क़ौम का सिर्फ एक उसूल है, या हमारे साथ हैं या हमारे ख़िलाफ़।"


लेकिन बुश की इच्छा के विपरीत ईरान के रहबर की प्रतिक्रिया बिल्कुल अलग थी, "...जो भी हमारे साथ यानी अमरीकियों के साथ न हो, आतंकवादियों के साथ है! यह बहुत निरर्थक बात है; नहीं, ऐसा नहीं है। बहुत से लोग अमरीका के साथ हैं, लेकिन दुनिया के तमाम आतंकवादियों से ज़्यादा ख़तरनाक हैं। आज इस्राईल की सरकार में सब से ख़तरनाक आतंकवादी मौजूद हैं। जिन लोगों के हाथों में इस सरकार की लगाम है, वो लोग हैं जिन्होंने सब से त्रासदीपूर्ण आतंकवादी घटनाओं के लिए, ख़ुद निर्देश दिए हैं, उसमें शरीक हुए हैं; आज भी हर दिन टार्गेट किलिंग कर रहे हैं और अमरीका के साथ हैं। इसलिए, ऐसा नहीं है कि जो आपके साथ है वह आतंकवादियों के साथ नहीं है। नहीं; सबसे ख़तरनाक और सबसे दुष्ट आतंकवादी इस वक़्त आपके साथ हैं। इसका विपरीत बिन्दु भी ऐसा ही है; जो शख़्स हमारे साथ नहीं है, आतंकवादियों के साथ है; नहीं, हम आपके साथ नहीं है, लेकिन आतंकवादियों के साथ भी नहीं हैं।"


इस स्वाधीनता के नमूने को इस्लामी इंक़ेलाब के आरंभिक बरसों में भी देखा जा सकता है। अमरीकी दूतावास पर कंट्रोल हासिल करने के बाद, जिमी कार्टर ने इमाम ख़ुमैनी को ख़त लिखा और विशेष प्रतिनिधि को उनसे मुलाक़ात के लिए भेजा। इमाम ख़ुमैनी ने जवाब में, मुलाक़ात से मना करते हुए लिखा, "सूचना के मुताबिक़, कार्टर के विशेष प्रतिनिधि ईरान आ रहे हैं और वह ईरान आने और मुझसे मुलाक़ात का इरादा रखते हैं। इसलिए यह याद दिलाना ज़रूरी समझता हूं कि अमरीकी सरकार ने शाह को शरण देकर, साफ़ तौर पर ईरान की मुख़ालेफ़त का एलान किया और दूसरी ओर जैसा कि कहा जा चुका है कि ईरान में अमरीकी दूतावास, पाकीज़ा इस्लामी आंदोलन के ख़िलाफ़ हमारे दुश्मनों का अड्डा है, इसलिए विशेष प्रतिनिधियों की मुझसे मुलाक़ात किसी भी तरह मुमकिन नहीं है और इसके साथ ही, 
1-संसद के सदस्य हरगिज़ उनसे मुलाक़ात न करें।
2-कोई भी अधिकारी को उनसे मिलने का अधिकार नहीं है।
3-अगर अमरीका, अपदस्थ शाह -हमारे अज़ीज़ राष्ट्र के नंबर एक दुश्मन- को ईरान के हवाले कर दे और हमारे आंदोलन के ख़िलाफ़ जासूसी न करे, तो कुछ विषयों पर जो हमारी क़ौम के हित में हैं, वार्ता का द्वार खुल सकता है। 
रूहुल्लाह अलमूसवी अलख़ुमैनी"


जो चीज़ इस तुलना से स्पष्ट हो जाती है वह अंतर्राष्ट्रीय आर्डर में ईरान की स्थिति का बदलना हैः वह मुल्क विगत में जिसके फ़ैसले विदेशी ताक़तों के प्रभाव में थे, इस्लामी इंक़ेलाब के बाद ऐसे खिलाड़ी में बदल गया है कि स्वाधीनता को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति का उसूल बना लिया है।


इस्लामी इंक़ेलाब के सर्वोच्च नेता उन दिनों और इन दिनों के अंतर के बारे में कहते हैं, "अतीत के दिनों और मौजूदा दिनों के दरमियान इस तुलना को फैलाया जा सकता है लेकिन एक जुमले में, ईरान के अज़ीज़ अवाम के सेवक की हैसियत से मैं एलान करता हूं कि वह पिछला दौर, जिस में हमारे वापस जाने का हमारा दुश्मन इच्छुक है, गुज़र चुका है और अब कभी वापस नहीं आएगा।"
लेखकः डॉक्टर हुसैन मोहम्मदी सीरत, इमाम सादिक़ यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर